August 3, 2026
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कोविड का लौटता साया: आपकी इम्युनिटी ही आपका असली बचाव।

विभिन्न क्षेत्रों में कोविड-१९ के मामले पुन: सामने आ रहे हैं। ऐसे समय में एक चिकित्सा विशेषज्ञ बता रही हैं कि हमारी रक्षा प्रणाली कैसे कार्य करती है, स्वास्थ्य से जुड़े भ्रमों का निवारण करती है, और दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए प्रभावी उपाय प्रस्तुत करती है।



डॉ. के. सुधा राव
एम.बी.बी.एस. (दिल्ली), डी.ए. (लखनऊ), एम.फिल. (बिट्स, पिलानी)

हैदराबाद, केरल और उत्तर प्रदेश में कोविड-१९ के मामले दोबारा सामने आने का समाचार पढ़ते ही मेरा मन महामारी के उन विकट दिनों में लौट गया, और वे दृश्य किसी चलचित्र की भांति सामने घूमने लगे। उस समय जो एक शब्द मेरे भीतर गहराई से गूंजा, वह था, “रोग प्रतिरोधक क्षमता” (इम्यूनिटी)।
मैंने इस बात पर विचार किया कि व्यक्तिगत और सामूहिक रोग प्रतिरोधक क्षमता कैसे विकसित होती है, इस आशा के साथ कि वैसा संकट फिर कभी न आए। लगभग प्रत्येक व्यक्ति ने अपने किसी पारिवारिक सदस्य, मित्र या प्रियजन को खोया है, और वह पीड़ा आज भी बनी हुई है। आज भी अनेक लोग हृदय और अन्य महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित करने वाली कोविड-उत्तर (पोस्ट-कोविड) जटिलताओं से जूझ रहे हैं।
रोग प्रतिरोधक क्षमता क्या है?
रोग प्रतिरोधक क्षमता शरीर की वह जन्मजात एवं अर्जित योग्यता है, जिसके द्वारा वह विषाणु (वायरस), जीवाणु (बैक्टीरिया) और अन्य बाह्य सूक्ष्मजीवों सहित हानिकारक रोगजनकों का विरोध करता है और स्वयं की रक्षा करता है। इसे मुख्य रूप से तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:
पहला, जन्मजात प्रतिरोधक क्षमता (इननेट इम्यूनिटी): यह वह प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली है जिसके साथ हम जन्म लेते हैं। यह त्वचा, आंसू और पेट के अम्ल (एसिड) जैसे शारीरिक और रासायनिक अवरोधों के माध्यम से सुरक्षा की पहली पंक्ति के रूप में कार्य करती है। यह बाह्य आक्रमणकारियों को रोकने के लिए तुरंत कार्य करती है, यद्यपि इसका दायरा सामान्य होता है।
दूसरा अर्जित / सक्रिय प्रतिरोधक क्षमता (एडॉप्टिव / एक्टिव इम्यूनिटी): यह वह विशेष सुरक्षा प्रणाली है जिसे हमारा शरीर समय के साथ विकसित करता है। जब शरीर किसी रोगजनक या टीके के संपर्क में आता है, तो प्रतिरक्षा प्रणाली उन जीवों को लक्षित करने के लिए विशेष प्रतिरक्षी (एंटीबॉडी) का निर्माण करती है, जिससे भविष्य में संपर्क होने पर तीव्र और अधिक प्रभावी प्रतिक्रिया मिलती है। सक्रिय प्रतिरोधक क्षमता दीर्घकालिक और प्रायः जीवनभर रहने वाली होती है।
तीसरा, निष्क्रिय प्रतिरोधक क्षमता (पैसिव इम्यूनिटी): यह बाहरी स्रोत से प्राप्त अल्पकालिक सुरक्षा है। उदाहरण के लिए, नवजात शिशु को गर्भनाल और स्तनपान के माध्यम से माता से एंटीबॉडी प्राप्त होते हैं। इसके अतिरिक्त, तत्काल सुरक्षा के लिए एंटीबॉडी युक्त रक्त उत्पादों (जैसे इम्युनोग्लोबुलिन) के माध्यम से भी निष्क्रिय प्रतिरोधक क्षमता दी जा सकती है। यद्यपि यह तुरंत कार्य करती है, परंतु इसकी सुरक्षा केवल कुछ सप्ताहों से महीनों तक ही रहती है।
हमारे शरीर की रक्षा प्रणाली अंगों, ऊतकों और विशेष कोशिकाओं के एक जटिल और परस्पर जुड़े नेटवर्क पर निर्भर करती है जो निरंतर मिलकर कार्य करते हैं:
• लसीका ग्रंथियां और लसीका वाहिकाएं (लिम्फ नोड्स): लसीका द्रव को छानती हैं और बाहरी आक्रमणकारियों को फंसाती हैं।
• अस्थि मज्जा (बोन मैरो): रक्त कोशिकाओं, विशेष रूप से श्वेत रक्त कोशिकाओं के उत्पादन का प्राथमिक स्थान।
• थाइमस और प्लीहा (स्पलीन): प्रतिरक्षा कोशिकाओं के परिपक्व होने और रक्त को छानने के लिए आवश्यक अंग।
• टॉन्सिल, एडेनोइड्स, पेयर्ज़ पैच और अपेंडिक्स: शरीर में प्रवेश के मार्गों की रक्षा करने वाले मुख्य श्लेष्मा (म्यूकोसल) प्रहरी।
• श्वेत रक्त कोशिकाएं (डब्ल्यू.बी.सी.): पहली पंक्ति के कोशिकीय सैनिक जो रोगजनकों की पहचान करते हैं और उन्हें नष्ट करते हैं।
इन अंगों का स्वास्थ्य बनाए रखना प्रतिरोधक क्षमता के स्तर को ऊंचा रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। इन अंगों को प्रभावित करने वाली कोई भी अंतर्निहित बीमारी या पुरानी स्थिति शरीर की रक्षा क्षमता को सीधे तौर पर कमजोर करती है।
प्रतिरक्षा प्रणाली की खराबी के १६ चेतावनी संकेत
प्रतिरक्षा प्रणाली के असंतुलन के शुरुआती संकेतों पहचानकर समय पर चिकित्सीय परामर्श और उपचार लिया जा सकता है:
एलर्जी संबंधी स्थितियां: दमा (अस्थमा), एक्जिमा, या त्वचा की बार-बार होने वाली अत्यधिक संवेदनशीलता।
ऑटोइम्यून विकार: संधिवात (रूमेटाइड अर्थराइटिस), टाइप १ मधुमेह, सीलिएक रोग, मल्टीपल स्केलेरोसिस, या सोरायसिस।
रेनाउड रोग / ठंडे हाथ-पैर: सीमित परिधीय रक्त प्रवाह के कारण हाथों या पैरों का अत्यधिक ठंडा होना।
निरंतर पाचन संबंधी समस्याएं: दीर्घकालिक अतिसार (दस्त), कब्ज, या आंत के सूक्ष्मजीवों का असंतुलन।
शुष्क आंखें और पुरानी थकान: शुष्क श्लेष्मा झिल्ली के साथ अकारण अत्यधिक थकान।
बार-बार हल्का बुखार होना: बार-बार हल्का बुखार या अकारण सिरदर्द होना।
त्वचा पर चकत्ते और धूप के प्रति संवेदनशीलता: त्वचा पर अकारण दाने या धूप के प्रति असामान्य संवेदनशीलता।
जोड़ों में लगातार दर्द: बिना किसी चोट के मांसपेशियों में दर्द और जोड़ों में सूजन।
त्वचा का रंग उड़ना / बालों का झड़ना: एलोपेसिया (चकत्ते में बाल झड़ना) या विटिलिगो (त्वचा पर सफेद दाग)।
बार-बार संक्रमण होना: बार-बार सर्दी-जुकाम होना, साइनस का संक्रमण, या घावों का धीरे-धीरे भरना।
तंत्रिका संवेदनाएं: हाथों और पैरों में लगातार झुनझुनी या सुन्नता महसूस होना।
निगलने में कठिनाई (डिस्फेजिया): भोजन या तरल पदार्थ निगलते समय दर्द या कठिनाई होना।
वजन में अकारण बदलाव: आहार में बदलाव किए बिना तेजी से वजन घटना या बढ़ना।
पीलिया (जॉन्डिस): यकृत (लिवर) या लाल रक्त कोशिकाओं की समस्याओं के कारण आंखों या त्वचा का पीला पड़ना।
उच्च सूजन दर (इन्फ्लेमेशन): रक्त जांच में उच्च सूजन संकेतक (सी.आर.पी./ई.एस.आर.)।
अंगों की कार्यक्षमता में कमी: लसीका, प्लीहा या श्लेष्मा ऊतकों की कार्यप्रणाली का कमजोर पढ़ना।
रोग प्रतिरोधक क्षमता से जुड़े ६ सामान्य भ्रम
प्रतिरोधक क्षमता के विषय में भ्रामक जानकारी गलत स्वास्थ्य विकल्पों और सुरक्षा के झूठे अहसास की ओर ले जा सकती है। चिकित्सा दृष्टिकोण से मुख्य भ्रमों की सत्यता इस प्रकार है:
• भ्रम १: पूरक आहार (सप्लीमेंट्स) लेने से तुरंत रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है।
सत्य: पोषक पूरक आहार पोषण की कमी को पूरा करते हैं, परंतु वे कोई जादुई गोली नहीं हैं। ताजे फल, सब्जियों और साबुत अनाज से युक्त संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और पर्याप्त नींद कहीं अधिक प्रभावी हैं।
• भ्रम २: ठंडा मौसम सीधे तौर पर सर्दी और फ्लू का कारण बनता है।
सत्य: ठंडा मौसम स्वयं विषाणु संक्रमण का कारण नहीं बनता; यह विषाणुओं से होता है। ठंडे महीनों में अधिक समय घर के अंदर बिताने से विषाणुओं का प्रसार बढ़ता है। स्वच्छता बनाए रखना और समय पर टीकाकरण ही सर्वोत्तम सुरक्षा है।
• भ्रम ३: तनाव का प्रतिरोधक क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
सत्य: दीर्घकालिक मानसिक या शारीरिक तनाव कोर्टिसोल हार्मोन के स्तर को बढ़ाता है, जो समय के साथ प्रतिरक्षा कोशिकाओं की कार्यप्रणाली को सक्रिय रूप से दबा देता है।
• भ्रम ४: अत्यधिक स्वच्छता ही पूर्ण सुरक्षा की गारंटी है।
सत्य: यद्यपि स्वच्छता आवश्यक है, जीवाणुरोधी (एंटीबैक्टेरियल) उत्पादों का अत्यधिक उपयोग और एंटीबायोटिक दवाओं का अनुचित प्रयोग विपरीत प्रभाव डाल सकता है। साबुन और पानी से नियमित हाथ धोना ही पर्याप्त और सुरक्षित है।
• भ्रम ५: मजबूत प्रतिरोधक क्षमता का अर्थ है कि आप कभी बीमार नहीं पड़ेंगे।
सत्य: एक स्वस्थ प्रतिरक्षा प्रणाली आपको सभी रोगजनकों से मुक्त नहीं बनाती, परंतु यह बीमारी की गंभीरता को काफी कम कर देती है और ठीक होने की गति को तेज करती है।
• भ्रम ६: प्रतिरोधक क्षमता जीवनभर एक समान बनी रहती है।
सत्य: आयु बढ़ने के साथ प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से कम होती जाती है। इसे बनाए रखने और मजबूत करने के लिए जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव आवश्यक हैं।
रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने के उपाय
प्रतिरक्षा प्रणाली आंतरिक और बाह्य खतरों के विरुद्ध शरीर की प्राथमिक ढाल के रूप में कार्य करती है। अपनी दिनचर्या में निम्नलिखित आदतों को शामिल करने से यह उच्चतम दक्षता के साथ कार्य करती रहती है:
टीकाकरण समय पर कराएं: शैशवावस्था से शुरू होने वाले समयबद्ध टीके प्रमुख संक्रामक रोगों से महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करते हैं। पूर्ण स्वच्छता बनाए रखें: घर, रसोई, कार्यस्थल और सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता का ध्यान रखें। नियमित व्यायाम करें: रक्त संचार को बेहतर बनाने और प्रतिरक्षा कोशिकाओं की गतिशीलता बढ़ाने के लिए प्रतिदिन २०-३० मिनट शारीरिक गतिविधि करें। परिष्कृत (रिफाइंड) खाद्य पदार्थों और शर्करा पर नियंत्रण रखें: मैदा और अत्यधिक चीनी के स्थान पर साबुत अनाज, दालें और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों का सेवन करें। प्रोबायोटिक्स को आहार में शामिल करें: पाचन और प्रतिरोधक क्षमता के लिए आवश्यक आंत के लाभदायक सूक्ष्मजीवों के पोषण हेतु दैनिक आहार में दही और किण्वित (फर्मेंटेड) खाद्य पदार्थ शामिल करें। प्रतिदिन धूप लें: पर्याप्त धूप लेने से विटामिन डी के निर्माण में मदद मिलती है, जो कैल्शियम के अवशोषण और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है। पोषक तत्वों से भरपूर आहार लें: हरी पत्तेदार सब्जियां, अंडे, दुग्ध उत्पाद, लहसुन, प्याज, ताजे फल और हल्दी जैसे सूजन-रोधी (एंटी-इन्फ्लेमेटरी) मसालों को प्राथमिकता दें। तंबाकू और अत्यधिक मदिरापान से बचें: धूम्रपान का त्याग करें और अल्कोहल का सेवन नियंत्रित करें, क्योंकि ये प्रतिरक्षा सुरक्षा को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाते हैं।
प्रतिरक्षा स्वास्थ्य के लिए आवश्यक चिकित्सीय जांच
यदि आपको अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली में किसी गड़बड़ी का संदेह है, तो इन लक्षित नैदानिक परीक्षणों (डायग्नोस्टिक टेस्ट) के लिए अपने चिकित्सक से परामर्श लें:
• पूर्ण रक्त गणना (सी.बी.सी.): संपूर्ण रक्त कोशिकाओं के स्वास्थ्य और श्वेत रक्त कोशिकाओं (डब्ल्यू.बी.सी.) की संख्या का मूल्यांकन करती है।
• मात्रात्मक इम्युनोग्लोबुलिन परीक्षण: मुख्य सुरक्षात्मक एंटीबॉडी (IgG, IgA, IgM) के स्तर को मापता है।
• एंटीबॉडी टाइटर परीक्षण: पूर्व संक्रमणों या टीकों (जैसे खसरा, टिटनेस, हेपेटाइटिस बी) के विरुद्ध एंटीबॉडी के सटीक स्तर का निर्धारण करता है।
• सूजन संकेतक परीक्षण (सी.आर.पी. और ई.एस.आर.): शरीर में सक्रिय सूजन का पता लगाने के लिए सी-रिएक्टिव प्रोटीन (CRP) और एरिथ्रोसाइट सेडिमेंटेशन रेट (ESR) की जांच की जाती है।
रोग प्रतिरोधक क्षमता समग्र जीवंतता और कोशिकीय स्वास्थ्य की आधारशिला है। प्रतिदिन ७-८ घंटे की गुणवत्तापूर्ण नींद, पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार, २०-३० मिनट का दैनिक शारीरिक व्यायाम, तनाव प्रबंधन तकनीक, तंबाकू और मदिरापान से दूरी, तथा व्यक्तिगत स्वच्छता के उच्च मानकों को अपनाकर अपनी रक्षा प्रणाली को सुरक्षित रखें। इन सक्रिय कदमों को उठाकर आप अपने शरीर को बीमारियों से लड़ने के लिए एक मजबूत और जीवनभर रहने वाला सुरक्षा कवच प्रदान कर सकते हैं।

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