के विश्वदेव राव
भारतीय लोकतंत्र की यात्रा सदा से मतभेदों, विमर्शों और आत्ममंथन से पोषित रही है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) प्रत्येक नागरिक को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जो किसी भी सजीव समाज की नींव मानी जाती है। किंतु इसी स्वतंत्रता के साथ-साथ पुस्तकों पर रोक और उनकी जांच-परख की एक लंबी कथा भी चलती रही है।
ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है, क्या पुस्तकें सचमुच समाज या राष्ट्र की अखंडता के लिए कोई सच्चा संकट हैं, या वे केवल सत्ताधारियों की बेचैनी का कारण बनती रही हैं?
भारत में पुस्तकों की जांच-परख का इतिहास समय के साथ बदलती राजनीतिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का दर्पण रहा है। यदि हम इस यात्रा को क्रम से देखें, तो पाबंदी का केंद्र-बिंदु निरंतर बदलता गया है।
स्वतंत्रता के आरंभिक दशकों में रोक का मुख्य उद्देश्य शासन की प्रशासनिक चूकों को छिपाना अथवा विश्व-मंच पर देश की छवि को धूमिल होने से बचाना था। उदाहरण के तौर पर, स्टेनली वॉलपर्ट की रचना “नाइन आवर्स टू रामा” पर 1962 में रोक लगाई गई, क्योंकि इसमें महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को अपेक्षाकृत सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि से चित्रित किया गया था एवं रचना में गांधी जी की सुरक्षा में हुई प्रशासनिक चूकों की झलक भी सत्ता को असहज करने वाली थी। इसी तरह बर्ट्रेंड रसेल की “अनआर्म्ड विक्ट्री”, जो 1962 के भारत-चीन संघर्ष की पृष्ठभूमि पर लिखी गई थी, उस पर रोक लगाकर सरकार ने तत्कालीन सैन्य और रणनीतिक कमजोरियों पर परदा डालने का यत्न किया। वहीं वी. एस. नायपॉल की रचना “एन एरिया ऑफ डार्कनेस” पर पाबंदी की जड़ में देश की निर्धनता और व्यवस्था पर उनका तीखा व्यंग्य था, जिसे तत्कालीन सत्ता ने विश्व-स्तर पर भारत की छवि बिगाड़ने वाला ठहराया।
राज्यों के स्तर पर भी अनेक रचनाओं पर रोक लगाई गई है। जैसे जसवंत सिंह की पुस्तक “जिन्ना: इंडिया, पार्टिशन, इंडिपेंडेंस”। अगस्त 2009 में इसके प्रकाशन के तुरंत बाद, तत्कालीन गुजरात सरकार ने सरदार वल्लभभाई पटेल की “छवि बिगाड़ने और अपमानजनक संदर्भों” का हवाला देकर राज्य में इसकी बिक्री पर पाबंदी लगा दी थी। तथापि सितंबर 2009 में गुजरात उच्च न्यायालय ने इस रोक को निरस्त कर दिया, जिसके पश्चात पुस्तक की बिक्री और वितरण पर लगी बंदिश हट गई। इस रचना में मुहम्मद अली जिन्ना के विषय में सकारात्मक दृष्टिकोण रखा गया था और भारत के विभाजन के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू तथा सरदार पटेल की नीतियों की आलोचना की गई थी।
जैसे-जैसे देश का राजनीतिक परिदृश्य बदलता गया, रोक-टोक का रुख भी छवि-रक्षा से हटकर धार्मिक भावनाओं और पहचान की राजनीति की ओर मुड़ गया। इसकी शुरुआत सलमान रुश्दी की रचना “द सैटेनिक वर्सेज” से हुई, वर्ष 1988 में भारत इस पुस्तक पर पाबंदी लगाने वाले आरंभिक देशों में गिना गया। यहां मुख्य चिंता कानून-व्यवस्था बनाए रखना और धार्मिक अशांति को टालना थी। इसके पश्चात लेखक राम स्वरूप की रचना “अंडरस्टैंडिंग इस्लाम थ्रू हादीस” पर लगी रोक भी इसी बात की साक्षी बनी कि राज्य धार्मिक संवेदनाओं को लेकर अत्यंत सतर्क, और कभी-कभी बचावमूलक, हो चुका था। इस पुस्तक के हिंदी अनुवाद पर 1990 में और मूल अंग्रेजी संस्करण पर 1991 में रोक लगाई गई थी। किंतु दिलचस्प यह है कि वर्ष 2001 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कुछ आपत्तिजनक अंशों को हटाने की शर्त पर इस पुस्तक के प्रकाशन को पुनः स्वीकृति दे दी, यह घटना स्वयं इस बात का प्रमाण है कि दीर्घकाल में विचारों पर लगाई गई रोक अंततः न्याय और तर्क के सामने टिक नहीं पाती।
आज का सबसे मूलभूत प्रश्न यही है – क्या किसी विचार को रोककर उसका अंत किया जा सकता है?
इंटरनेट, सामाजिक माध्यमों और डिजिटल क्रांति के इस युग में पुस्तकों पर भौतिक पाबंदी लगाना पूर्णतः अप्रासंगिक और अव्यावहारिक हो चुका है। किसी रचना की छपाई रुकने से उसके विचार नहीं थमते; क्षण भर में उसकी प्रति, अनुवाद संसार के कोने-कोने तक पहुंच जाता है।
किसी भी परिपक्व लोकतंत्र की सच्ची पहचान यह नहीं है कि वह असहमतियों को कितनी सहजता से दबा देता है, बल्कि यह है कि वह आलोचनात्मक, तीखे और असहज करने वाले विचारों को सहने की कितनी क्षमता रखता है। लोकतंत्र केवल सहमति का उत्सव नहीं, अपितु असहमति को स्थान देने का नाम है।
इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि जब भी किसी पुस्तक पर रोक लगाई जाती है, तब लोगों में उसे पढ़ने की उत्सुकता अनेक गुना बढ़ जाती है। वर्तमान युग में इस परिघटना को “स्ट्राइसैंड प्रभाव” कहा जाता है, अर्थात जिस वस्तु को छिपाने का यत्न किया जाएगा, वह उतनी ही अधिक प्रचारित होगी। रोक-टोक प्रायः लेखकों और उनकी रचनाओं को असमय वह ख्याति दे देती है, जिसकी वे शायद हकदार भी न रही हों।
शासन को केवल उन्हीं अत्यंत दुर्लभ अवसरों पर हस्तक्षेप करना चाहिए, जहां किसी पुस्तक से प्रत्यक्ष रूप से हिंसा भड़कने का वास्तविक जोखिम हो। इसके अतिरिक्त, वैचारिक मतभेदों का सामना पाबंदी की छड़ी से नहीं, अपितु अधिक तर्कसंगत, सुदृढ़ और प्रतिवाद-युक्त विचारों से किया जाना चाहिए। किसी विचार का जवाब केवल एक श्रेष्ठतर विचार ही हो सकता है, रोक की कैंची नहीं।
अंततः यह स्मरण रखना आवश्यक है कि पुस्तकें विचारों की वाहक होती हैं, और विचार भय से नहीं, संवाद से जीते-मरते हैं। एक जागरूक और आत्मविश्वासी राष्ट्र वही है जो असहज सत्यों का सामना करने से नहीं कतराता, बल्कि उन्हें बहस के मैदान में उतारने का साहस रखता है।
