September 4, 2026
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केoविश्वदेव राव (पत्रकार)
हाल ही में अखबार के पन्नों से गुजरते हुए एक खबर पर दृष्टि ठिठक गई। सूचना कोलकाता के मोमिनपुर-खिदरपुर इलाके की थी, जहां पिछले लगभग छह दशकों से जन्माष्टमी का उत्सव हिंदू और मुस्लिम समुदाय मिलकर मनाते आ रहे थे। मान्यता है कि इस आयोजन की शुरुआत ही एक मुस्लिम समाज सेवक ने की थी और कालांतर में दोनों समुदायों के युवाओं ने इसे परवान चढ़ाया। लेकिन इस वर्ष, आयोजन समिति ने इसे विशुद्ध रूप से केवल हिंदुओं के लिए कर दिया है। तर्क दिया गया कि धार्मिक अनुष्ठानों को ‘पवित्र’ रखने और एक सफाई अभियान के तहत अन्य धर्मों को प्रबंधन से बाहर किया जाना आवश्यक था। यह खबर सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं है, यह हमारे समय की उस संकुचित होती मानसिकता का सटीक रेखाचित्र है, जो असीम को सीमित में, और विराट को वामन में बदलने पर आमादा है।
अब सवाल यह है कि जो स्वयं ब्रह्मांड का स्वामी है, क्या उसे किसी मोहल्ले की समिति के संरक्षण की आवश्यकता है?
क्या आस्था के दरवाजे बंद करने से धर्म मजबूत होता है, या फिर हमारी अपनी असुरक्षाएं उजागर होती हैं? और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—क्या कृष्ण जैसे सर्वव्यापी और कालजयी व्यक्तित्व को किसी एक विशेष पूजा-पद्धति या समुदाय की परिधि में बांधा जा सकता है?
ये ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर यदि हम ईमानदारी से न खोजें, तो हम उस विरासत के अपराधी होंगे जो हमें सदियों के सह-अस्तित्व से मिली है।
यह बहस की बात हो सकती है कि अनुष्ठानों का प्रबंधन कौन करे, लेकिन यह विचारणीय है कि हम “किस” आराध्य की बात कर रहे हैं। हम उस “कृष्ण” की बात कर रहे हैं जिनका कोई एक आयाम नहीं है। महाभारत के युद्ध में जब मोहग्रस्त अर्जुन अपने कर्तव्य से विमुख हो रहे थे, तब श्री कृष्ण ने उन्हें अपना विराट “विश्वरूप” दर्शन कराया था। महाभारत के संजय ने उस रूप को कुछ यूँ वर्णित किया था:
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥
अर्थ: उस समय पाण्डुपुत्र अर्जुन ने देवों के देव श्रीकृष्ण के उस शरीर में एक ही स्थान पर स्थित, अनेक भागों में बंटे हुए संपूर्ण ब्रह्मांड को देखा था।
उस महाकाय स्वरूप में केवल कुरुक्षेत्र का मैदान नहीं था; उसमें संपूर्ण ब्रह्मांड, अगणित आकाशगंगाएं, भूत-भविष्य और समस्त जीव-जंतु समाहित थे। श्रीमद्भगवद्गीता स्पष्ट उद्घोष करती है कि सारी सृष्टि उन्हीं से उत्पन्न होती है और अंतकाल में उन्हीं में समा जाती है। यथार्थ यह है कि जब कण-कण में उसी सत्ता का वास है, जब हर जीव उसी का अंश है, तो फिर यह तय करने का अधिकार किसी आयोजन समिति को कैसे मिल गया कि उस सर्वव्यापी के प्रांगण में कौन आ सकता है और कौन नहीं?
गौर करने की बात है कि भारतीय चिंतन की मूल धारा हमेशा से समावेशी रही है। इसी दर्शन को रेखांकित करते हुए, अगस्त 2026 में अमेरिका में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “अगर हिंदू ये सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होना चाहिए, तो वो हिंदू नहीं रह जाता।” यह वाक्य कोई सामान्य राजनीतिक बयान नहीं है, यह सनातन धर्म के उस विश्वव्यापी सत्य की स्वीकृति है जो विविधता को खतरे के रूप में नहीं, बल्कि प्रकृति के विस्तार के रूप में देखता है। लेकिन विडंबना देखिए कि एक ओर वैश्विक मंचों पर हम अपने दर्शन की इस विशालता का उद्घोष करते हैं, और दूसरी ओर हमारी गली-मोहल्लों में एक साझा सांस्कृतिक उत्सव को शुद्ध करने के नाम पर संकीर्णता की दीवारें खड़ी कर दी जाती हैं। सिद्धांत और व्यवहार का यह विरोधाभास हमारे समय का सबसे बड़ा वैचारिक संकट है।
भक्ति भाव का मनोविज्ञान बड़ा विचित्र और अद्भुत है। उपलब्ध स्रोतों और संतों की वाणियों के अनुसार, जब भक्त के मन में कृष्ण का प्रेम बसता है, तो दुनिया के सारे दुःख, मोह, संताप और बनावटी भेद स्वतः ही भस्म हो जाते हैं। कृष्ण की मुरली की धुन किसी का गोत्र या धर्म पूछकर नहीं गूंजती। यदि ऐसा होता, तो क्या रसखान यह गा पाते कि “मानुष हों तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।”, क्या मुगल खानदान की ताज बीबी अपना सब कुछ छोड़कर कृष्ण के प्रेम में बावरी हो पातीं? क्या हसरत मोहानी, जो एक पक्के नमाजी और हाजी थे, कृष्ण को “हजरत श्री कृष्ण” कहकर उनके प्रेम में मथुरा की खाक छानते? इन विभूतियों ने कृष्ण को किसी संकीर्ण चश्मे से नहीं देखा था। उन्होंने उस मुरलीमनोहर में उस परम सत्य को देखा जो इंसान को इंसान से जोड़ता है।
कृष्ण का संपूर्ण जीवन ही स्थापित रूढ़ियों और सीमाओं को तोड़ने का महाकाव्य है। जो जन्मते ही कारागार के ताले तोड़ दे, जो इंद्र के अहंकार को अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन उठाकर चकनाचूर कर दे और जो धर्म की रक्षा के लिए युद्ध के बनाए गए कुलीन नियमों को भी धता बता दे, उसे हम आज की संकुचित सामाजिक पहचानों में कैसे कैद कर सकते हैं?
फिलवक्त, ऐसा लगता है कि हम कृष्ण की पूजा तो कर रहे हैं, लेकिन उनके दर्शन को भूल गए हैं। हम उनके नाम पर जयकारे तो लगा रहे हैं, लेकिन उनके उस चरित्र को नकार रहे हैं जो गरीब सुदामा को गले लगाता है, जो स्त्रियों के सम्मान के लिए सत्ता से टकरा जाता है, और जो सर्वहारा का सच्चा सखा है।
हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहां धर्म को अक्सर एक आध्यात्मिक यात्रा के बजाय एक सामाजिक घेराबंदी के उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। कृष्ण सबके हैं, वे गोकुल के ग्वालों के हैं, मथुरा के पीड़ितों के हैं, कुरुक्षेत्र के योद्धाओं के हैं और उन सबके हैं जिनका हृदय प्रेम से भरा है। उन्हें हिंदू, मुसलमान, सिख या ईसाई के संकीर्ण खानों में बांटना उनके विराट स्वरूप का ही नहीं, बल्कि हमारी अपनी मानवीय चेतना का भी अपमान है।
अतः, निष्कर्ष के रूप में हमें अपने गिरेबान में झांकने की आवश्यकता है। असली चुनौती यह है कि हमारे अपने हृदय का विस्तार सिकुड़ता जा रहा है। हम डर और अलगाव की ऐसी ग्रंथियों से पीड़ित हो चुके हैं कि हमें अपने ही आराध्य को बचाने के लिए बहिष्कार का सहारा लेना पड़ रहा है। ऐसे में यह तीखा प्रश्न हम सभी के सामने मुँह बाए खड़ा है, जब हम इस नश्वर देह को त्यागकर उस विश्वरूपधारी के समक्ष खड़े होंगे, तो क्या हम गर्व से उन्हें अपने बहिष्कार के नियम-कानून दिखाएंगे, या फिर अनंत आकाश को अपनी छोटी सी मुट्ठी में कैद करने की इस हास्यास्पद कोशिश पर शर्मिंदा होंगे?
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
“जहाँ योगेश्वर भगवान कृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहीं पर श्री (लक्ष्मी), विजय (सफलता), विभूति (वैभव/ऐश्वर्य) और अचल (निश्चित) नीति है, ऐसा मेरा मत है।”

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