Photo by George Pak on <a href="https://www.pexels.com/photo/child-holding-a-smartphone-7985560/" rel="nofollow">Pexels.com</a>
लखनऊ। बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन आज पढ़ाई, गेमिंग, वीडियो और सोशल मीडिया का साधन बन चुका है। लेकिन जब यही स्क्रीन उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा बन जाती है, तो फोन बंद करने या अचानक छीन लेने पर कुछ बच्चों में तेज गुस्सा, चिड़चिड़ापन, बहस और आक्रामक व्यवहार देखने को मिल सकता है। अमेरिकी एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (AAP) के अनुसार, स्क्रीन की सीमा लगाए जाने पर कुछ बच्चों में शुरुआत में नकारात्मक व्यवहार और भावनात्मक प्रतिक्रिया बढ़ सकती है।
फोन सिर्फ मनोरंजन नहीं, आदत बन जाता है
मोबाइल गेम, शॉर्ट वीडियो और सोशल मीडिया बच्चों को लगातार नए और तुरंत मिलने वाले मनोरंजन का अनुभव देते हैं। लंबे समय तक स्क्रीन इस्तेमाल करने के बाद अचानक फोन हटाना बच्चे के लिए एक बड़े बदलाव जैसा महसूस हो सकता है।
AAP के मुताबिक, जब स्क्रीन की नई सीमा लगाई जाती है तो कुछ बच्चों में शिकायत, रोना या विरोध कुछ समय के लिए बढ़ सकता है। इसे व्यवहार में “extinction burst” कहा जाता है। यानी पुरानी आदत अचानक रोकने पर शुरुआती प्रतिक्रिया ज्यादा तीखी हो सकती है।
क्या मोबाइल बच्चों को हिंसक बना रहा है?
इस सवाल का जवाब सीधे “हां” में देना सही नहीं होगा। बच्चों के आक्रामक व्यवहार के पीछे कई कारण हो सकते हैं। WHO के अनुसार डिजिटल तकनीक का बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों हो सकता है और इसका असर व्यक्ति तथा उसके वातावरण के अनुसार बदलता है।
WHO ने अत्यधिक डिजिटल इस्तेमाल से जुड़े संभावित प्रभावों में नींद की समस्या, शारीरिक गतिविधि में कमी और कुछ मामलों में आक्रामक व्यवहार जैसे मुद्दों का उल्लेख किया है। हालांकि, हर बच्चे पर इसका प्रभाव समान नहीं होता।
अचानक फोन छीनने के बजाय नियम पहले से तय करें
AAP की सलाह के मुताबिक स्क्रीन से जुड़े नियम बच्चे को समझाकर और नियमित दिनचर्या के हिस्से के रूप में लागू करना मददगार हो सकता है। बच्चे को पहले से बताया जा सकता है कि उसका स्क्रीन टाइम कब खत्म होगा।
उदाहरण के लिए, अचानक फोन छीनने के बजाय कहा जा सकता है—”10 मिनट बाद गेम बंद करना है।” इससे बच्चे को गतिविधि खत्म करने के लिए मानसिक रूप से तैयार होने का समय मिलता है।
AAP यह भी सुझाव देता है कि बच्चों को नियम बनाने की प्रक्रिया में कुछ विकल्प देने और सीमाएं दंडात्मक तरीके से लागू करने के बजाय सहयोगात्मक तरीके से लागू करने से विरोध कम करने में मदद मिल सकती है।
माता-पिता की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण
अगर बच्चा फोन बंद करने पर गुस्सा करता है तो उसी समय माता-पिता भी चिल्लाने लगें, तो स्थिति और बिगड़ सकती है। AAP के अनुसार ऐसे समय में अभिभावक को शांत रहना, बच्चे को शांत होने का समय देना और आक्रामक व्यवहार के बदले भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
बच्चे के शांत होने के बाद यह समझाना अधिक उपयोगी हो सकता है कि मोबाइल क्यों सीमित किया जा रहा है और इसके बदले वह कौन-सी गतिविधि कर सकता है।
स्क्रीन कम करनी है तो विकल्प भी देने होंगे
मोबाइल हटाकर बच्चे को केवल खाली छोड़ देना समस्या का समाधान नहीं है। खेल, किताबें, संगीत, परिवार के साथ समय, हॉबी और दोस्तों के साथ वास्तविक गतिविधियां स्क्रीन के विकल्प बन सकती हैं।
WHO भी बच्चों के स्वस्थ विकास में पर्याप्त नींद और शारीरिक गतिविधि के महत्व पर जोर देता है।
किन संकेतों को गंभीरता से लें?
अगर बच्चा मोबाइल न मिलने पर कभी-कभार नाराज होता है तो यह अपने आप में किसी बीमारी का प्रमाण नहीं है। लेकिन अगर स्क्रीन को लेकर लगातार गंभीर संघर्ष हो, पढ़ाई या नींद प्रभावित हो, बच्चा परिवार से अलग रहने लगे या उसका आक्रामक व्यवहार घर और स्कूल दोनों जगह दिखाई देने लगे, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है।
AAP के अनुसार फोन या सोशल मीडिया की पहुंच सीमित करने पर बहुत तीखी भावनात्मक प्रतिक्रिया कभी-कभी दूसरे सामाजिक या भावनात्मक कारणों की ओर भी संकेत कर सकती है।
निष्कर्ष
बच्चे के हाथ से मोबाइल छीनना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। असली चुनौती है—बच्चे को डिजिटल दुनिया और वास्तविक जीवन के बीच संतुलन सिखाना।
स्पष्ट नियम, नियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद, खेल-कूद, परिवार के साथ समय और माता-पिता का शांत व्यवहार स्क्रीन टाइम कम करने की प्रक्रिया को आसान बना सकते हैं। मोबाइल को दुश्मन बनाने के बजाय उसके इस्तेमाल की स्वस्थ आदत विकसित करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
