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नई रिसर्च में सामने आया कि कोशिकाओं की ऊर्जा उत्पादन क्षमता में गिरावट को कुछ हद तक रोका या सुधारा जा सकता है
उम्र बढ़ने के साथ शरीर की कोशिकाओं में होने वाले बदलावों को समझने की दिशा में वैज्ञानिकों को एक महत्वपूर्ण सफलता मिली है। जर्मनी के Leibniz Institute on Aging के शोधकर्ताओं ने माइटोकॉन्ड्रिया की उम्र बढ़ने से जुड़ी एक अहम प्रक्रिया की पहचान की है। माइटोकॉन्ड्रिया को आमतौर पर कोशिकाओं का “पावरहाउस” कहा जाता है, क्योंकि ये शरीर की कोशिकाओं के लिए ऊर्जा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, उम्र बढ़ने के साथ फॉस्फेटिडाइलकोलाइन (Phosphatidylcholine) नामक एक महत्वपूर्ण झिल्ली लिपिड का निर्माण धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसका असर माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना और उनके आपस में जुड़ने तथा परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता पर पड़ता है।
इस बदलाव के कारण कोशिकाओं की ऊर्जा उत्पादन क्षमता प्रभावित हो सकती है और उम्र बढ़ने से जुड़े शारीरिक बदलावों को बढ़ावा मिल सकता है।
चोलिन से दिखा सुधार
इस अध्ययन का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि शोधकर्ताओं ने इस प्रक्रिया को पूरी तरह स्थायी नहीं पाया। C. elegans नामक प्रयोगशाला में इस्तेमाल होने वाले छोटे कृमियों तथा तनावग्रस्त मानव कोशिका कल्चर पर किए गए प्रयोगों में फॉस्फेटिडाइलकोलाइन या उसके अग्रदूत चोलिन (Choline) की आपूर्ति करने पर माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना और कार्यक्षमता में सुधार देखा गया।
शोध से संकेत मिलता है कि माइटोकॉन्ड्रिया में उम्र से जुड़े कुछ बदलावों को प्रभावित किया जा सकता है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि चोलिन या कोई एक सप्लीमेंट इंसानों को अचानक “जवान” बना देगा।
उम्र बढ़ने के इलाज की नई दिशा
वैज्ञानिकों के लिए इस खोज की अहमियत इसलिए अधिक है क्योंकि इससे उम्र बढ़ने की प्रक्रिया में शामिल एक संभावित माल्लिएबल यानी बदला जा सकने वाला जैविक लक्ष्य सामने आया है। भविष्य में इसी तंत्र को समझकर ऐसी उपचार पद्धतियां विकसित की जा सकती हैं, जो उम्र से जुड़ी बीमारियों को देर से विकसित होने में मदद करें।
यह अध्ययन Nature Communications में प्रकाशित हुआ है और इसका शीर्षक है: “Aging-associated decline of phosphatidylcholine synthesis is a malleable trigger of natural mitochondrial aging.”
हालांकि अभी ये परिणाम मुख्य रूप से प्रयोगशाला मॉडल और कोशिका अध्ययनों पर आधारित हैं। इसलिए इंसानों में इसके प्रभाव, सही मात्रा और दीर्घकालिक सुरक्षा को समझने के लिए आगे व्यापक शोध और क्लिनिकल अध्ययन जरूरी होंगे।
