इजराइल के संसदीय चुनाव में इस बार ऐसा राजनीतिक समीकरण सामने आया है, जिसने देश की राजनीति में हलचल मचा दी है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन उनका गठबंधन सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत हासिल नहीं कर सका। दूसरी तरफ इजराइल की अरब नेतृत्व वाली राजनीतिक पार्टियों ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए संसद में कुल 19 सीटें जीत ली हैं। इस नतीजे ने सरकार गठन की पूरी गणित बदल दी है।
30 अक्टूबर को जारी अंतिम चुनाव परिणामों के मुताबिक, नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं, जबकि गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें हासिल हुई हैं। वहीं अरब नेतृत्व वाली दो पार्टियों ने मिलकर 19 सीटों पर जीत दर्ज की है। इजराइल की संसद यानी नेसेट में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है।
कौन हैं इजराइल के अरब नागरिक और उनकी पार्टियां?
इस पूरे चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा इजराइल की अरब पार्टियों की हो रही है। दरअसल, इजराइल की आबादी में लगभग 21 प्रतिशत लोग अरब समुदाय से आते हैं। इनमें बड़ी संख्या फिलिस्तीनी मूल के उन लोगों की है जो इजराइल के नागरिक हैं। उन्हें मतदान करने, चुनाव लड़ने और संसद में प्रतिनिधित्व करने का अधिकार प्राप्त है।
इन नागरिकों को आमतौर पर अरब इजराइली या इजराइल के अरब नागरिक कहा जाता है। उनकी अपनी अलग सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान है। इजराइल की राजनीति में लंबे समय से उनका प्रतिनिधित्व रहा है, लेकिन इस बार उनकी सीटों की संख्या में हुई बढ़ोतरी ने उन्हें सत्ता के समीकरण में बेहद महत्वपूर्ण बना दिया है।
इस चुनाव में दो प्रमुख अरब नेतृत्व वाली राजनीतिक पार्टियों ने शानदार प्रदर्शन किया है।
- जॉइंट लिस्ट (Joint List): यह अरब नेतृत्व वाला राजनीतिक गठबंधन है, जिसने चुनाव में 11 सीटें हासिल की हैं। यह गठबंधन अरब नागरिकों के अधिकारों, समानता और फिलिस्तीन से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाता है।
- राअम (Ra’am): इसका पूरा नाम यूनाइटेड अरब लिस्ट है। यह इजराइल के इस्लामिक मूवमेंट की दक्षिणी शाखा से जुड़ी पार्टी है। मंसूर अब्बास इसके प्रमुख नेता हैं। इस पार्टी ने 8 सीटें जीती हैं।
इस तरह दोनों पार्टियों को मिलाकर 19 सीटें मिली हैं। यह इजराइल की संसद में अरब नेतृत्व वाली पार्टियों का अब तक का सबसे बड़ा प्रतिनिधित्व है।
19 सीटों से कैसे बदल सकता है सत्ता का समीकरण?
इजराइल की राजनीति में इन 19 सीटों का महत्व इसलिए बढ़ गया है क्योंकि किसी भी बड़े राजनीतिक गठबंधन के पास अपने दम पर सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं है।
सीटों का गणित इस प्रकार है:
नेतन्याहू का गठबंधन: 53 सीटें
गादी आइजेनकोट का विपक्षी गठबंधन: 48 सीटें
अरब नेतृत्व वाली पार्टियां: 19 सीटें
संसद की कुल सीटें: 120
अगर विपक्षी गठबंधन को अरब पार्टियों का समर्थन मिल जाता है, तो उसके पास 67 सीटों का समर्थन जुटाने की संभावना बन सकती है। इस स्थिति में नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने का रास्ता खुल सकता है।
हालांकि, केवल सीटों का जोड़ सरकार बनाने की गारंटी नहीं है। इसके लिए राजनीतिक सहमति और सांसदों का वास्तविक समर्थन भी जरूरी होगा।
क्या नेतन्याहू की सरकार गिर सकती है?
चुनाव परिणाम आने के बाद नेतन्याहू के सामने सबसे बड़ी चुनौती बहुमत जुटाने की है। उनकी पार्टी लिकुड 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी है, लेकिन उनके पूरे गठबंधन को केवल 53 सीटें मिली हैं।
दूसरी ओर गादी आइजेनकोट विपक्षी गठबंधन के नेता के रूप में सरकार बनाने की कोशिश कर सकते हैं। उन्हें अरब पार्टियों के समर्थन से बहुमत तक पहुंचने की उम्मीद है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पेच भी है। विपक्ष के कई प्रमुख नेता अरब पार्टियों के साथ औपचारिक गठबंधन करने के पक्ष में नहीं हैं। दक्षिणपंथी विपक्षी नेता एविगडोर लिबरमैन भी अरब पार्टियों के साथ साझेदारी की संभावना को खारिज कर चुके हैं।
ऐसे में विपक्ष के सामने मुश्किल यह है कि नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए उसे उन्हीं अरब पार्टियों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है, जिनके साथ सहयोग करने को लेकर उसके अपने सहयोगियों में मतभेद हैं।
अब किसकी सरकार बनने की उम्मीद है?
फिलहाल सरकार बनाने की दौड़ में नेतन्याहू की स्थिति विपक्ष के मुकाबले मजबूत दिखाई दे रही है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि उनकी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है और उनके गठबंधन के पास 53 सीटें हैं। हालांकि, यह संख्या बहुमत से आठ कम है।
दूसरी तरफ विपक्ष के पास अरब पार्टियों के समर्थन से बहुमत का गणित तो मौजूद है, लेकिन सभी विपक्षी दल इस रास्ते पर सहमत नहीं हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, आने वाले दिनों में तीन संभावनाएं सबसे महत्वपूर्ण हो सकती हैं। पहली, नेतन्याहू विपक्ष के कुछ दलों को साथ लेकर व्यापक गठबंधन सरकार बना लें। दूसरी, विपक्ष अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने की कोशिश करे। तीसरी, यदि कोई भी पक्ष बहुमत जुटाने में सफल नहीं होता तो देश में दोबारा चुनाव कराने की नौबत आ सकती है।
अंतिम चुनाव परिणाम राष्ट्रपति इसाक हर्जोग को सौंपे जाने के बाद सरकार गठन की औपचारिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। तब यह स्पष्ट होगा कि किस नेता के पास सरकार बनाने का बेहतर अवसर है।
इजराइल की राजनीति में क्या होगा बड़ा बदलाव?
इस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश यह है कि इजराइल के अरब नागरिकों की राजनीतिक ताकत पहले से कहीं ज्यादा बढ़कर सामने आई है। 19 सीटों के साथ उनकी राजनीतिक पार्टियां अब केवल विपक्ष की आवाज नहीं हैं, बल्कि सरकार बनाने के समीकरण में भी निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में हैं।
यह परिणाम इजराइल की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत कर सकता है। खासकर ऐसे समय में जब देश सुरक्षा, क्षेत्रीय संघर्ष, फिलिस्तीन के मुद्दे और आंतरिक राजनीतिक मतभेदों से जूझ रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अरब पार्टियों का यह ऐतिहासिक प्रदर्शन नेतन्याहू की सत्ता का अंत करेगा या फिर राजनीतिक जोड़-तोड़ के जरिए वह एक बार फिर सरकार बनाने में सफल होंगे। इसका जवाब आने वाले दिनों में होने वाली गठबंधन वार्ता से सामने आएगा।
