राम मंदिर की सियासत के नए रंग


बंजर भूमि को उपजाऊ करने के लिए किसानों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं होती कि उनकी वो कोशिश पेशानी पर खींची लकीरों को सुनहरा कर दे |

लेकिन सियासत की बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए कोई रॉकेट साइंस की जरूरत नहीं होती| बस ऐसा मुद्दा देश की नींव में डालना पड़ता है जिससे सियासी भूमि पर सत्ता की उपज हो अयोध्या ऐसा ही मुद्दा बन गया है ।

6 दिसम्बर 1992 को राम का नाम जपने वाले सत्ता से दूर बैठे लोगों ने ईस मुद्दे का बीज देश की नींव में डाला था और उसके बाद वक़्त वक़्त पर उसमें खाद और पानी डाला जाता रहा| फसल आज भी जिन्दा है लेकिन काटेगा कौन???

आज के दौर में ये सवाल यक्ष प्रश्न बन गया है| कल तक राम मंदिर और बाबरी मस्जिद मुद्दे में दो पक्ष मुद्दई थे| हरे रंग की टोली और माथे पर सजी रोली लेकिन जब अयोध्या की आबोहवा में एक बार फिर राम मंदिर निर्माण को लेकर कई पक्ष ज्ञान और बयान दे रहे हैं तो अपनों के बीच ही मुद्दे के जन्मदाता बनने की होड़ शुरू हो गई है|

राम मंदिर बनाये जाने के हिमायती अपने झंडे को दूसरे के झंडे से ऊँचा करने के लिए कई फ़ीट लंबा डंडा लगा रहे हैं| तारीख भी तय है, वक़्त भी तय है जब मस्जिद के हिमायती नदारद रहेंगे लेकिन मंदिर के पक्षकार अयोध्या में हुंकार भरेंगे और ये हुंकार खुद को सबसे बड़ा राम भक्त साबित करने की है|

दअरसल 25 नवम्बर की तारीख तय की गई है जब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अयोध्या कूच करेंगे| सरकार को सरकार में आने की वजह और आधार याद दिलाएंगे| राम नाम की हुंकार के साथ लाखों की तादाद में शिवसैनिकों के पहुँचने का दावा है लेकिन माहौल भी गर्म हो जाएगा| क्योंकि इस भगवे को चुनोती देने के लिए हरा रंग अयोध्या की सड़कों पर नही दिखेगा| बल्कि झगडा भगवा का भगवा से होगा|

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शिवसेना के अयोध्या कूच के एलान के साथ ही वीएचपी ने भी अपने तंबू और बम्बू अयोध्या की जमीं पर गाढ़ने शुरू कर दिए हैं| 25 नवम्बर को वीएचपी भी बड़ा कार्यक्रम करने जा रही है जिसका उद्देश्य राम मंदिर निर्माण में तेजी लाना है| लेकिन सियासत में जो दिखता है वैसा होता कहाँ हैं| दरअसल शिवसेना के उठते स्वर और बढ़ते कदम को थामने के लिए वही तारीख और दिन चुना गया है जिस दिन अयोध्या में शिवसेना होगी|




इन दिनों राम मंदिर को लेकर माहौल गर्म है| सरकार दवाब में है और उम्मीद जताई जा रही है कि एक बड़ा आंदोलन कोई बड़ा फैसला लेने पर सरकार को मजबूर कर सकता है| ऐसे में खुद का नाम और चेहरा चमकने से पीछे कोई नहीं रहना चाहता और वैसे भी प्रवीण तोगड़िया के वीएचपी से बाहर जाने के बाद वीएचपी के सुर बीजेपी की लय के साथ सरकार का राम मंदिर राग और सुरीला कर रहा है|

ऐसे में शिवसेना-बीजेपी के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर उसी मुद्दे की जड़ में ललकारने जा रही है| ऐसे में सरकार वीएचपी के माध्यम से शिवसेना की विरोध की धार को कुंद करने का काम करेगी|

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