जानें क्यों मनाया जाता है मोहर्रम, क्या है इमाम हुसैन का पैग़ाम


क्या है मोहर्रम

‘मोहर्रम’ इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीने का नाम है। इसी महीने से इस्लाम का नया साल शुरू होता है। लेकिन चूंकि इस महीने मे इमाम हुसैन ने इस्लाम को बचाने के लिए अपनी और अपने साथियों की शहादत दी इसी वजह ये महीना उनकी याद मे मनाया जाता है| इस महीने की 10 तारीख को रोज़े-ए-आशूरा (Day Of Ashura) कहा जाता है, इसी दिन को अंग्रेजी कैलेंडर में मोहर्रम कहा गया है।

क्यों मनाया जाता है मोहर्रम

मोहर्रम के महीने में इस्लाम धर्म के संस्थापक हज़रत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 अनुयाइयों को शहीद कर दिया गया था। हज़रत हुसैन इराक के शहर करबला में यजीद की फौज से लड़ते हुए शहीद हुए थे।

इमाम हुसैन को इस वजह से थी यजीद से नाइत्तेफाकी

इस्लाम में सिर्फ एक ही खुदा की इबादत करने के लिए कहा गया है। छल-कपट, झूठ, मक्कारी, जुआ, शराब, जैसी चीजें इस्लाम में हराम बताई गई हैं। हज़रत मोहम्मद ने इन्हीं निर्देशों का पालन किया और इन्हीं इस्लामिक सिद्घान्तों पर अमल करने की हिदायत सभी मुसलमानों और अपने परिवार को भी दी।

दूसरी तरफ इस्लाम का जहां से उदय हुआ, मदीना से कुछ दूर ‘शाम’ में मुआविया नामक शासक का दौर था। मुआविया की मृत्यु के बाद शाही वारिस के रूप में यजीद, जिसमें सभी अवगुण मौजूद थे, वह शाम की गद्दी पर बैठा।

यजीद चाहता था कि उसके गद्दी पर बैठने की पुष्टि इमाम हुसैन करें क्योंकि वह मोहम्मद साहब के नवासे हैं और उनका वहां के लोगों पर उनका अच्छा प्रभाव है।

यजीद जैसे शख्स को इस्लामी शासक मानने से हज़रत मोहम्मद के घराने ने साफ इन्कार कर दिया था क्योंकि यजीद के लिए इस्लामी मूल्यों की कोई कीमत नहीं थी। यजीद की बात मानने से इनकार करने के साथ ही उन्होंने यह भी फैसला लिया कि अब वह अपने नाना हज़रत मोहम्मद साहब का शहर मदीना छोड़ देंगे ताकि वहां अमन कायम रहे।




इस हाल में तय हुई थी जंग

इमाम हुसैन हमेशा के लिए मदीना छोड़कर परिवार अपने कुछ चाहने वालों के साथ इराक की तरफ जा रहे थे। लेकिन करबला के पास यजीद की फौज ने उनके काफिले को घेर लिया। यजीद ने उनके सामने शर्तें रखीं जिन्हें इमाम हुसैन ने मानने से साफ इनकार कर दिया। शर्त नहीं मानने के एवज में यजीद ने जंग करने की बात रखी।

यजीद से बात करने के दौरान इमाम हुसैन इराक के रास्ते में ही अपने काफिले के साथ फुरात नदी के किनारे तम्बू लगाकर ठहर गए। लेकिन यजीदी फौज ने इमाम हुसैन के तम्बुओं को फुरात नदी के किनारे से हटाने का आदेश दिया और उन्हें नदी से पानी लेने की इजाजत तक नहीं दी।

ऐसे शुरू हुई जंग

इमाम जंग का इरादा नहीं रखते थे क्योंकि उनके काफिले में केवल 72 लोग शामिल थे। जिसमें छह माह का बेटा उनकी बहन-बेटियां, पत्नी और छोटे-छोटे बच्चे शामिल थे। यह तारीख एक मोहरर्म थी, और गर्मी का वक्त था। गौरतलब हो कि आज भी इराक में (मई) गर्मियों में दिन के वक्त सामान्य तापमान 50 डिग्री से ज्यादा होता है। सात मोहर्रम तक इमाम हुसैन के पास जितना खाना और खासकर पानी था वह खत्म हो चुका था।

इमाम सब्र से काम लेते हुए जंग को टालते रहे। 7 से 10 मुहर्रम तक इमाम हुसैन उनके परिवार के सभी सदस्य और अनुनायी भूखे प्यासे रहे।

10 मुहर्रम को इमाम हुसैन की तरफ एक-एक करके गए हुए शख्स ने यजीद की फौज से जंग की। जब इमाम हुसैन के सारे साथी शहीद हो चुके थे तब asr (दोपहर) की नमाज के बाद इमाम हुसैन खुद गए और वह भी मारे गए। इस जंग में इमाम हुसैन का एक बेटे जैनुलआबेदीन जिंदा बचे क्योंकि 10 मोहर्रम को वह बीमार थे और बाद में उन्हीं से मुहमम्द साहब की पीढ़ी चली।

इसी कुरबानी की याद में मोहर्रम मनाया जाता है। करबला का यह वाकया इस्लाम की हिफाजत के लिए हजरत मोहम्मद के घराने की तरफ से दी गई कुर्बानी है। इमाम हुसैन और उनके पुरुष साथियों व परिजनों को कत्ल करने के बाद यजीद ने हजरत इमाम हुसैन के परिवार की औरतों को गिरफ्तार करने का हुक्म दिया।

इमाम हुसैन की शहादत के बाद

यजीद ने खुद को विजेता बताते हुए हुसैन के लुटे हुए काफिले को देखने वालों को यह बताया कि यह हश्र उन लोगों का किया गया है जो यजीद के शासन के खिलाफ गए। यजीद ने मुहमम्द के घर की औरतों पर बेइंतहा जुल्म किए। उन्हें कैदखाने में रखा जहां हुसैन की मासूम बच्ची सकीना की (सीरिया) कैदखाने में ही मौत हो गई।

बहरहाल इस वाकये को 1400 से ज्यादा साल बीत चुके हैं लेकिन आज भी उनकी क़ुरबानी को ज़िंदा रखने के लिए उनका ग़म मनाया जाता है|

देश के कई प्रसिद्द हस्तियों ने इमाम हुसैन के बारे मे क्या कहा है



मोहनदास करमचंद गांधी / Mohandas Karamchand Gandhi ( Father of the Nation – India ) :
“I learnt from Hussain (A.S.) how to achieve victory while being oppressed. My faith is that the progress of Islam does not depend on the use of sword by its believers, but the result of the supreme sacrifice of Hussain (A.S.).”

    “मैंने हुसैन (अ.स.) से सीखा की मज़लूमियत में किस तरह जीत हासिल की जा सकती है। इस्लाम की बढ़ोतरी तलवार पर निर्भर नहीं करती बल्कि हुसैन (अ.स.) के बलिदान का एक नतीजा है जो एक महान संत थे।”
रबिन्द्रनाथ टैगौर / Rabindranath Tagore (Indian Nobel Prize Winner in Literature 1913): 
 “In order to keep alive justice and truth, instead of an army or weapons, success can be achieved by sacrificing lives, exactly what Imam Hussain (A.S.) did in Karbala.”
“Imam Hussain is the leader of humanity.”
“Imam Hussain (a.s.) will warm the coldest heart.” “Hussain’s sacrifice indicates spiritual liberation.”
    “इन्साफ और सच्चाई को ज़िंदा रखने के लिए, फौजों या हथियारों की ज़रुरत नहीं होती है। कुर्बानियां देकर भी फ़तह (जीत) हासिल की जा सकती है, जैसे की इमाम हुसैन (अ.स.) ने कर्बला में किया।
“इमाम हुसैन (अ.स.) मानवता के नेता हैं”
“इमाम हुसैन ठन्डे दिलों को जोश दिलाते रहेंगे।” “इमाम हुसैन (अ.स.) का बलिदान अध्यात्मिक मुक्ति को इंगित करता है।”
पंडित जवाहरलाल नेहरु / Pandit Jawaharlal Nehru (1st Prime Minister of India): 
    “Imam Hussain’s sacrifice is for all groups and communities, an example of the path of righteousness.”
    “इमाम हुसैन (अ.स.) की क़ुर्बानी तमाम गिरोहों और सारे समाज के लिए है, और यह क़ुर्बानी इंसानियत की भलाई की एक अनमोल मिसाल है।”
डॉ. राजेंद्र प्रसाद / Dr. Rajendra Prasad (1st President of India) : 
    “The sacrifice of Imam Hussain (A.S.) is not limited to one country, or nation, but it is the hereditary state of the brotherhood of all mankind.”
    “इमाम हुसैन (अ.स.) की कुर्बानी किसी एक मुल्क या कौम तक सिमित नहीं है, बल्कि यह लोगों में भाईचारे का एक असीमित राज्य है।”
डॉ. राधाकृष्णन / Dr. Radha Krishnan (Ex President of India)  : 
    “Though Imam Hussain (A.S.) gave his life almost 1300 years ago, but his indestructible soul rules the hearts of people even today.”
    “अगरचे इमाम हुसैन (अ.स.) ने सदियों पहले अपनी शहादत दी, लेकिन इनकी इनकी पाक रूह आज भी लोगों के दिलों पर राज करती है।”
स्वामी शंकराचार्य / Swami Shankaracharya (Hindu Religious Priest) : 
    “It is Hussain’s sacrifice that has kept Islam alive or else in this world there would be no one left to take Islam’s name.
    “यह इमाम हुसैन (अ.स.) की कुर्बानियों का नतीजा है कि आज इस्लाम का नाम बाक़ी है नहीं तो आज इस्लाम का नाम लेने वाला पुरी दुनिया में कोई भी नहीं होता”
श्रीमती सरोजिनी नायडू / Sarojini Naidu (Great India Poetess titled  Nightingale of India) : 
    “I congratulate Muslims that from among them, Imam Hussain (A.S.), a great human being was born, who is revered and honored totally by all communities.”
    “मैं मुसलमानों को इसलिए मुबारकबाद पेश करना चाहती हूँ की यह उनकी खुशकिस्मती है कि उनके बीच दुनिया की सब से बड़ी हस्ती इमाम हुसैन (अ.स.) पैदा हुए जो संपूर्ण रूप से दुनिया भर के तमाम जाती और समूह के दिलों पर राज किया और करता है।”

इस्लाम जिंदा होता है हर करबला के बाद।

Facebook Comments

Leave a Reply